मुझे ईल्म नहीं इस बात का
मैं कहाँ जा रहा हूँ
पर जहाँ जा रहा हूँ
बढा जा रहा हूँ
गिरता हूँ , संभलता हूँ
और फिर गिर जाता हूँ
इन टेढ़ी मेढ़ी गलिओं में
कही गुम हो जाता हूँ
मिलते है कई लोग यहाँ ,
मुझे , इन गलिओं में
कुछ खटकते है, कुछ भा जाते है
पर जीवन की आपाधापी में
सारे गुम हो जाते हैं
सोचता हूँ , मिलजाए कोई
जो चले संग मेरे
और पूरे करे
हम, अपने सपने
इन्ही सारे सपनो में
डूबा जा रहा हूँ
उम्मीद के किनारे
विशवास के सहारे
बढा जा रहा हूँ !!
बढा जा रहा हूँ !!
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